Its not just a copy-paste it's my effort..

Archive for June, 2014

दुःख का अधिकार

     मनुष्य एक सामाजिक जीव है, जिसके जीवन के प्रत्येक पहलु पर इसका बड़ा विशेष प्रभाव है। जन्म से मृत्यु तक हम समाज के ताने बने के अनुरूप ही अपना समस्त जीवन यापन करते है। कहने को तो ये सामाजिकता ही हमारा ऐसा विशेष गुण है जो हमें जीवो में सर्वॊच बनता है। जो हमे सहयोग, प्रेम, विनम्रता अदि गुणोंसे सम्पूर्ण बनता है, किन्तु आज का समाज सम्पूर्णता के इस रूप से भटक के किसी और रूप की सम्पूर्णता की और अग्रसारित है। ये बदलते विचार, प्रथाए, भावनाएं मनुष्यों को विभिन्न श्रेणियों में बाँट देती हैं। प्रायः मनुष्यके गुण-दोष ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है।वह हमारे लिए अनेक बंद दरवाजे खोल देती है, परंतु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि जब हम जरा नीचे झुककर समाज की जीवनशैली की अनुभूतियों को समझना चाहतेहैं; किन्तु उस समय हमारे व्यवहार में आया स्वार्थ ही बंधन और अड़चन बन जाता है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी जीवनशैली में निहित स्वार्थ हमें झुक सकनेसे रोके रहता है।

     बाजार में कुछ शोर सा कानो में पड़ा, पास गया तो पाया की एक दुर्बल सा आदमी ढीली सी शर्ट-पेंट पहने आँखों में आंसू भरे किसी से कुछ क्रंदित स्वरों में निवेदन सा करता प्रतीत हो रहा था। उस दुसरे आदमी की तेज-भारी आवाज में जैसे उन रोती आँखों की आवाज गुम सी हो रहीथी, आस पड़ोस के लोग भी थे पर  कोई कैसे आगे बढ़ता, कोई कैसे उनको रोकता? ढीलीशर्ट वाला तो बस दूसरे की तेज आवाज में खुद को दबा सा देख कर वही बैठ गया, सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रोते हुए अपने आंसू छुपा रहा था।

     पड़ोस की दुकानों के तख़्तों पर बैठे या बाज़ार में खड़े लोग घृणा से उसी व्यक्ति के सम्बन्ध में बात कर रहे थे। उस व्यक्ति का रोना देखकर मन में एक व्यथा-सी उठी, पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय क्या था?

     फुटपाथ पर उसके समीप बैठ सकने में मेरी जीवनशैली ही व्यवधान उत्पन्न कर रही थी। एक आदमी ने घृणा से एक तरफ़ थूकते हुए कहा,’क्या जमाना है! जवान लड़के को मरे पूरा दिन भी नहीं बीता और यह धन के लिए झगड़ रहा है।‘ दूसरे साहब अपनी नाक चडाते हुएकह रहे थे,’अरे जैसी नीयत होती है अल्ला भी वैसी ही बरकत देता है।’ सामने के फुटपाथ पर सफ़ेद कुर्ते में खड़े एक आदमी ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा, ‘अरे! इन लोगों का क्या है? ये कमीने लोग पैसे पर जान देते हैं। इनके लिए बेटा-बेटी, ख़सम-लुगाई, धर्म-ईमान सब बेकार है।‘ किरानाकी दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा, ‘अरे भाई, उनके लिए मरे-जिए का कोई मतलब न हो, पर समाज का तो खयाल करना चाहिए! जवान बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और वह यहाँ सड़क पर बाज़ार में आकर धन क लिए अपने बड़े भाई सेझगड़ रहा है? क्या अँधेर है!’

     पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने परपता लगा-उसका बीस बरस का जवान लड़का था। घर में मृतका पुत्र की माँ और एक छोटा भाई और भी  हैं। शहर के पास पुश्तैनी कुछ जमीन है, जिसके अधेभाग पर ये व्यक्ति खेती कर अपने बड़े बेटे को बहार बड़े कॉलेज में पड़ा रहा था। पिछले शुक्रवार की उस काली रात ही खबर आई की बेटे की सड़क दुर्घटना हो गई है, घर में पड़ा सारा पैसा जेवर बेटे के इलाज में लग गया पर इश्वर को तो कोन जनताहै। उधर कल ही बेटे की चित की आग भी शांत न हुई की छोटे बेटे की स्कूल कीफीस भी तो भरनी थी, जब अपनी खेत की फसल का रुख किया तो पाया की जब वो अपने बड़े बेटे की लाश को अपने कंधो पर अकेले उठाए लिए जा रहा था कि पीछे से बड़ेभाई ने सारी फसल काट के बेच भी दी थी।

     ज़िंदा आदमी नंगा भी रह सकता है, परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए? उसके लिए तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा लाना ही होगा, चाहे उसके लिए माँ के हाथों के छन्नी-कंगन ही क्यों न बिक जाएं।

     बेटा परलोक चला गया। घर में जो कुछ चूनी-भूसी थी सो उसे विदा करने में चली गई। बड़ा नहीं रहा तो क्या छोटे को तो पड़ाना ही है, जरूरते तो पूरी करनी ही है। बेटे की माँ का बदन बुख़ार से तवे की तरह तप रहा था, उसकी दावा भी तो लानी ही है!

     वो निर्बल सा व्यक्ति आँखों में आँसू समेटे हुए बड़े भैया के द्वारे चला; और चारा भी क्या था? वो भैया से अपने हिस्से के पैसे का साहस करके आया था, परंतु सगे भैया को भी ये मौका था, इस नवीन जीवनशैली का एक उद्धरण प्रस्तुत करने का। भतीजा मारा तो क्या हुआ भाई का हिस्सा कब्जाने का सुख तो कुछ और ही होता है, इस परिवर्तित समाज में। भैया के इंकार के बाद, सिर को घुटनों पर टिकाए हुए फफक-फफककर रोने के सिवाए चारा भी क्या था।

     कल जिसका बेटा चल बसा, आज वह खुले बाज़ार में सगे भाई से झगड़ रहा है, अपना धन मांग रहा है? और इस नवीन समाज के स्वयंभू बुद्धजीवियो के विचारों को सह रहा है। हाय रे पत्थर-दिल!

     उसपुत्र-वियोगी के दुःख का अंदाजा लगाने के लिए जब मन को सूझ का रास्ता नहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज हो जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाए, राहचलतों से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था। सोच रहा था- शोक करने, गम मनानेके लिए भी सहूलियत चाहिए। इस जीवनशैली जिसमे धन परिवार से ऊपर है; इस तथ्य को अपनाने का सहस चाहिए, स्वार्थ की सेवा के लिए रिश्तो का अंत चाहिए… क्योंकि दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है।